दबंग पब्लिक प्रवक्ता

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तेज रफ्तार ट्रक ने मचाया उत्पात, कई वाहन व दुकानें क्षतिग्रस्त, मामला दर्ज, ट्रक व चालक की तलाश जारी

अनूपपुर/कोतमा

कोतमा नगर के गहरवार प्रेस के पास में मंगलवार रात एक तेज रफ्तार ट्रक चालक ने लापरवाहीपूर्वक वाहन चलाते हुए जमकर उत्पात मचा दिया। ट्रक चालक ने सड़क किनारे खड़े वाहनों, दुकानों एवं अन्य सामानों को टक्कर मार दी, जिससे कई वाहन क्षतिग्रस्त हो गए तथा दो लोग घायल हो गए। घटना के बाद क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल निर्मित हो गया। कोतमा थाना पुलिस ने फरियादी की शिकायत पर आरोपी ट्रक चालक के विरुद्ध मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

वॉर्ड क्रमांक 12 गोविंदा कालरी निवासी जावेद खान पुत्र जहीर खान की गहरवार प्रेस के पास इलेक्ट्रॉनिक की दुकान है। मंगलवार रात लगभग 8:50 बजे वे अपनी दुकान बंद कर रहे थे। इसी दौरान शारदा मंदिर रोड की ओर से ट्रक क्रमांक MH43 CQ 6715 का चालक सोनू सोनकर पिता प्यारेलाल सोनकर निवासी गेट दफाई भालूमाडा तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक ट्रक चलाते हुए वहां पहुंचा और दुकान के सामने खड़ी टीवीएस मोटरसाइकिल क्रमांक CG16 C 5046 को जोरदार टक्कर मार दी। टक्कर लगने से मोटरसाइकिल जावेद खान के ऊपर गिर गई, जिससे उन्हें चोटें आईं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार ट्रक चालक ने वाहन को पीछे करते समय दुर्गेश चौधरी निवासी ग्राम ऊरा की मोटरसाइकिल क्रमांक CG16 C 9321 को भी टक्कर मार दी, जिससे मोटरसाइकिल क्षतिग्रस्त हो गई। घटना के दौरान मनोज जैन गन्ना वाले की कुर्सियां टूट गईं, वहीं अनिमेश प्रताप सिंह की दुकान की छत एवं शटर भी क्षतिग्रस्त हो गए। इसके बाद भी ट्रक चालक नहीं रुका और ट्रक लेकर गोविंदा कालरी की ओर भागने लगा।

भागते समय ट्रक चालक ने अभिषेक सिंह उर्फ विक्की निवासी भालूमाडा की कार को भी टक्कर मार दी तथा मुक्तेश्वर मिश्रा निवासी वार्ड क्रमांक 13 लहसुई कैम्प की मोटरसाइकिल को ठोकर मारते हुए उन्हें घायल कर दिया। कोतमा पुलिस ने आरोपी ट्रक चालक के विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस द्वारा ट्रक एवं आरोपी चालक की तलाश की जा रही है।

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आजादी के 78 साल बाद भी दाल गांव में बिना पानी, सड़क, बिजली के जीवन यापन कर रहे हैं ग्रामीण

*विधायक के कार्यशैली पर सवाल*

शहडोल 

जिले के ब्यौहारी अंतर्गत ग्राम पंचायत धांधोकुई के ग्राम दाल में आज भी ग्रामीण मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज तक गांव में न सड़क पहुंच सकी, न बिजली और न ही पीने के पानी की समुचित व्यवस्था हो पाई है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीणों को रोजाना दो किलोमीटर दूर पहाड़ों के नीचे स्थित झिरिया से पानी लाना पड़ रहा है।

भीषण गर्मी और तपती धूप के बीच जहां लोग घरों से निकलने से बचते हैं, वहीं दाल गांव के लोग पथरीले और खतरनाक रास्तों से होकर पहाड़ के नीचे उतरते हैं। ग्रामीण सिद्ध बाबा के पास स्थित एक गहरी झिरिया (झरना) से पीने का पानी भरकर अपने घर तक पहुंचाते हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों तक को यह कठिन सफर रोज तय करना पड़ता है।

गांव में एक हैंडपंप जरूर लगाया गया है, लेकिन उससे पानी नहीं निकल रहा। ग्रामीणों का कहना है कि गांव ऊंची पहाड़ी पर बसा होने के कारण पानी की समस्या लगातार बनी हुई है। मजबूरी में लोग प्राकृतिक झिरिया के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं।

गांव में सड़क सुविधा नहीं होने से ग्रामीणों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पक्की सड़क गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर बताई जा रही है। ऐसे में यदि कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल तक पहुंचाना बेहद मुश्किल हो जाता है, क्योंकि गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती।

ग्रामीण मथुरा सिंह ने बताया कि बिना बिजली के जीवन यापन करना बेहद कठिन है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। गांव में अंधेरा और परेशानी दोनों कायम हैं। ग्रामीण शुभकरण ने कहा कि गांव से पक्की सड़क करीब 5 किलोमीटर दूर है। ऐसे में किसी के बीमार पड़ने पर बड़ी दिक्कत होती है, क्योंकि गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती। ग्राम पंचायत धांधोकुई के सरपंच राकेश प्रजापति ने बताया कि दाल गांव में एक हैंडपंप लगा है, लेकिन उससे पानी नहीं निकलता। गांव काफी ऊंचाई पर बसा हुआ है। यहां करीब 40 घरों की आबादी है, जिसमें लगभग 250 लोग निवास करते हैं। 

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भाजपा पार्षद पर गरीब महिला से जमीन के नाम पर ठगी का आरोप, शासकीय भूमि को निजी बताकर ऐंठे लाखों रुपये

अनूपपुर

नगर पालिका परिषद अनूपपुर के वार्ड क्रमांक 2 के भाजपा पार्षद संजय चौधरी एवं सूर्य चौधरी पर एक गरीब मजदूर महिला से शासकीय भूमि को निजी पट्टे की जमीन बताकर लाखों रुपये लेने का गंभीर आरोप लगा है। मामले को लेकर पीड़िता ने मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में कलेक्टर के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर कठोर कार्रवाई की मांग की है।

शिकायतकर्ता रजनी रजक पति स्वर्गीय लाला रजक, निवासी वार्ड क्रमांक 6 सामतपुर, थाना, तहसील एवं जिला अनूपपुर ने आवेदन में बताया कि वह मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। वर्ष 2023-24 में वार्ड क्रमांक 2 निवासी सूर्य चौधरी एवं भाजपा पार्षद संजय चौधरी उनके घर पहुंचे और मॉडल स्कूल के पास स्थित भूमि को अपना पट्टे की जमीन बताते हुए विक्रय करने की बात कही।पीड़िता के अनुसार, दोनों आरोपियों ने पहले विद्युत ठेकेदार करतार केवलानी के सामने 50 हजार रुपये लिए। इसके बाद दो अलग-अलग अवसरों पर उनके घर पहुंचकर उनके बेटे के सामने 50-50 हजार रुपये और लिए। इस प्रकार कुल 1 लाख 50 हजार रुपये उनसे ले लिए गए। वहीं जमीन पर बाउंड्री निर्माण कराने के नाम पर महिला से दो गाड़ी मुरूम और दो गाड़ी ईंट भी गिरवाई गई, जिसमें लगभग 50 हजार रुपये अतिरिक्त खर्च हुए। इस तरह पीड़िता को करीब दो लाख रुपये की आर्थिक क्षति हुई।

महिला ने आवेदन में बताया कि घरेलू समस्याओं के चलते वह तीन माह तक बाउंड्री निर्माण नहीं करा सकीं। इसी दौरान उक्त जमीन किसी अन्य व्यक्ति को बेच दी गई। बाद में जानकारी मिली कि जिस भूमि को निजी पट्टे की जमीन बताया गया था, वह वास्तव में शासकीय भूमि है।

पीड़िता का आरोप है कि जब उन्होंने अपने पैसे वापस मांगे तो दोनों आरोपियों द्वारा लगातार टालमटोल की जाती रही। आज तक न तो राशि लौटाई गई और न ही कोई जमीन दिलाई गई। उन्होंने कलेक्टर से मांग की है कि उनसे ली गई पूरी राशि वापस दिलाई जाए तथा दोनों आरोपियों के विरुद्ध धोखाधड़ी सहित कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।

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अवैध शराब परिवहन करने पर 22 लीटर शराब सहित मोटरसाइकिल जब्त, मामला दर्ज

अनूपपुर

कस्बा भ्रमण के दौरान ग्राम कदमसरा में मुखबिर द्वारा सूचना दी गई की एक व्यक्ति आई-स्मार्ट स्पलेण्डर मोटर सायकल से बोरी में भरकर अंग्रेजी शराब अनूपपुर तरफ से छत्तीसगढ़ की ओर ले जा रहा है। सूचना पर ग्राम कदमसरा पुलिस टीम सड़क में रूककर आने जाने बाले वाहनो की चेकिंग की गई जो कुछ देर बाद  एक व्यक्ति आई-स्मार्ट स्पलेण्डर मोटर सायकल क्र. CG 12वAQ 1027 से अनूपपुर तरफ से आता दिखा, जिसे रोका गया नाम पता पूछां गया तो अपना नाम इतवार सिंह पिता बान सिंह उम्र 30 वर्ष निवासी ग्राम बेतलो थाना पसान जिला कोरबा (छ.ग.) का होना बताया, उक्त व्यक्ति अपने कंधो में सामने तरफ एक ग्रे रंग का बेग लटकाया हुआ था एवं मोटर सायकल पिछली सीट पर एक सफेद रंग की बोरी बांधा हुआ था, बैग एवं बोरी को खोलकर चैक किया गया तो बोरी एवं बेग के अंदर अंग्रेजी शराब गोवा विस्की के क्वाटर रखे हुये मिले। उक्त शराब रखने एवं बेंचने का कोई कागजात अनुज्ञप्ति नही होना बताया। शराब को बोरी से निकालकर पृथक पृथक गिनती किया गया तो एक सफेद रंग के प्लास्टिक की बोरी जिसमें सामने रोयल किंग लिखा हुआ था बोरी में भरी 104 नग शीशी अंग्रेजी शराब गोवा मात्रा 18.72 लीटर एवं एक ग्रे रंग का बेग जिसमें भरी 22 नग शीशी अंग्रेजी शराब गोवा मात्रा 3.96 लीटर शराब कुल मात्रा 22.68 लीटर कुल कीमती 17010/- रूपये  होना पाया गया जो मौके पर उक्त शराब एवं स्पलेण्डर मोटर सायकल कीमती करीब 50 हजार रूपये को जप्त किया गया। आरोपी इतवार सिंह  का कृत्य धारा 34(1) आबकारी एक्ट के तहत दण्डनीय पाये जाने से आरोपी के विरूद्ध अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया है।

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रेत के अवैध उत्खनन, परिवहन व भंडारण पर कार्यवाही, दो वाहन जब्त

शहडोल

कलेक्टर डॉ. केदार सिंह के निर्देशन एवं खनिज अधिकारी के मार्गदर्शन में जिले में अवैध रेत उत्खनन, परिवहन और भंडारण के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसी क्रम में खनिज विभाग की टीम ने ब्यौहारी एवं सोहागपुर क्षेत्र में दबिश देकर अवैध रेत परिवहन में संलिप्त दो वाहनों को जब्त किया है।

जानकारी के अनुसार, 25 मई 2026 को खनिज विभाग द्वारा ग्राम मटोला क्षेत्र में कार्रवाई करते हुए एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को अवैध रेत परिवहन करते पकड़ा गया। टीम ने मौके से लगभग 200 घनफीट रेत जब्त कर वाहन को अभिरक्षा में लिया।

इसके बाद 27 मई 2026 की देर रात लगभग 2 बजे तहसील सोहागपुर अंतर्गत ग्राम पिपरिया में रेत से भरा एक मेटाडोर वाहन पकड़ा गया। वाहन क्रमांक MP 19 GA 4357 अवैध रूप से रेत परिवहन करते पाया गया, जिसे विभागीय टीम ने तत्काल जब्त कर लिया।

खनिज विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संबंधित वाहन मालिकों एवं चालकों के विरुद्ध मध्यप्रदेश खनिज (अवैध उत्खनन, परिवहन तथा भंडारण का निवारण) नियम 2022 के तहत प्रकरण दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है।

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बिजुरी हत्याकांड व रीवा साध्वी हत्याकांड के विरोध में शिवसेना ने राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन

अनूपपुर/कोतमा

शिवसेना अनूपपुर जिला अध्यक्ष राजेश महाराणा ने एसडीएम कोतमा के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में बिजुरी में 20 वर्षीय युवती की हत्या और मामले के एकमात्र गवाह 17 वर्षीय अमन यादव की संदिग्ध मौत तथा रीवा में दो जैन साध्वियों की कार से कुचलकर की गई हत्या की घटनाओं पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया।

जिला अध्यक्ष राजेश महाराणा ने कहा, "जब से बिजुरी थाना प्रभारी विकास सिंह ने पदभार संभाला है, क्षेत्र में जघन्य अपराधों की बाढ़ आ गई है। गवाह तक सुरक्षित नहीं है। यह कानून व्यवस्था की पूरी तरह विफलता है। राज्यपाल महोदय से हमारी मांग है कि थाना प्रभारी को तत्काल हटाया जाए और दोनों मामलों की CBI जांच हाईकोर्ट के सीटिंग जज की निगरानी में हो।"

शिवसेना की मांगें दोनों हत्याकांडों के आरोपियों को 3 माह में फास्ट ट्रैक कोर्ट से मृत्युदंड। गवाह अमन यादव की मौत की CBI जांच। पीड़ित परिवारों को 50-50 लाख मुआवजा व सरकारी नौकरी। म.प्र. में "संत सुरक्षा अधिनियम" लागू हो। थाना प्रभारी बिजुरी का तत्काल स्थानांतरण।

जिला अध्यक्ष ने चेतावनी दी कि यदि 15 दिवस में ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो शिवसेना लोकतांत्रिक तरीके से उग्र आंदोलन करेगी, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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अमरकंटक के समग्र विकास पर मंथन, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रसाद ने श्री कल्याण सेवा आश्रम में की संतों से चर्चा

अनूपपुर

पवित्र नगरी अमरकंटक स्थित श्री कल्याण सेवा आश्रम में एक महत्वपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण मुलाकात का आयोजन हुआ, जिसमें राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रसाद ने आश्रम के प्रबंध न्यासी स्वामी हिमाद्री मुनि महाराज से भेंट कर क्षेत्र के विकास, धार्मिक पर्यटन और जनहित से जुड़े विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

बैठक के दौरान अमरकंटक की आध्यात्मिक पहचान को और सुदृढ़ करने, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा क्षेत्रीय विकास की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया गया। चर्चा में यह भी रेखांकित किया गया कि अमरकंटक केवल एक तीर्थस्थल ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है।

इस अवसर पर उपस्थित संतजनों ने भी अपने विचार साझा करते हुए अमरकंटक के संतुलित एवं दीर्घकालिक विकास के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

बैठक में स्वामी हरस्वरूप महाराज एवं स्वामी धर्मानंद महाराज भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। संतों ने सामाजिक समरसता, सेवा कार्यों और धार्मिक मूल्यों के संरक्षण को समय की आवश्यकता बताते हुए सकारात्मक संवाद को उपयोगी बताया। इस अवसर का वातावरण आध्यात्मिक गरिमा, सौहार्द और जनकल्याण के संकल्प से ओतप्रोत दिखाई दिया।

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महिला सशक्तिकरण एवं स्वरोजगार आधारित योजनाएं, स्व-सहायता समूह से जुड़कर चंद्रकली ने बदली अपनी तकदीर

उमरिया 

मध्यप्रदेश शासन की महिला सशक्तिकरण एवं स्वरोजगार आधारित योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रही हैं। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि जिले की अनेक महिलाएं आज आत्मविश्वास के साथ अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।

जिले के मानपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम कठार की निवासी चंद्रकली पटेल आज ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की प्रेरणादायक मिसाल बन चुकी हैं। सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बीच जीवन यापन करने वाली चंद्रकली ने स्व-सहायता समूह से जुड़कर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की, बल्कि आत्मनिर्भरता की नई पहचान भी बनाई।

चंद्रकली पटेल ने 10वीं तक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे घर-परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गईं। परिवार की सीमित आय के कारण घर का खर्च चलाना कठिन हो रहा था। वर्ष 2019 में वे जनपद स्तर पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुईं जहां उन्होंने देखा कि स्व-सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होकर सम्मानपूर्वक जीवन जी रही हैं। इस अनुभव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

प्रेरित होकर उन्होंने ग्राम कठार के क्रांति स्व-सहायता समूह की सदस्यता ग्रहण की। समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आया। उन्होंने समूह की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई और गांव की अन्य महिलाओं को भी समूह से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।

चंद्रकली पटेल ने समूह के माध्यम से सीसीएल से 50 हजार रुपये तथा सीआईएफ से 10 हजार रुपये का ऋण प्राप्त किया। इस राशि से उन्होंने सिलाई कार्य प्रारंभ किया। साथ ही अपने पति रामभगत पटेल के लिए ऑटो रिक्शा एवं गन्ना रस मशीन खरीदकर स्वरोजगार की नई शुरुआत की। वर्तमान में उनके पति कठार से मानपुर तक ऑटो चलाकर आय अर्जित कर रहे हैं जबकि चंद्रकली सिलाई कार्य के साथ घरेलू जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रही हैं। गर्मी के मौसम में गन्ना रस व्यवसाय से भी अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।

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बालिका संप्रेषण गृह एवं शिवालय शिशु गृह का किया निरीक्षण

शहडोल

जिले में महिला एवं बाल विकास विभाग अंतर्गत संचालित बाल देखरेख संस्थाओं यथा शासकीय बालिका संप्रेषण गृह एवं शिवालय शिशु गृह का किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 54 के तहत गठित जिला स्तरीय निरीक्षण समिति के अध्यक्ष एवं अपर कलेक्टर सरोधन सिंह, सदस्य सचिव जिला कार्यक्रम अधिकारी अखिलेश मिश्रा, सदस्य श्रीमती राखी शर्मा, पुष्पा द्विवेदी, अभिषेक चौकसे, डॉक्टर मुकुंद चतुर्वेदी एवं डॉ. गंगेश टांडिया द्वारा त्रैमासिक निरीक्षण किया गया। 

निरीक्षण के दौरान बालिका संप्रेषण गृह में 5 बालिकाएं एवं शिवालय शिशु गृह में 06 बच्चे निवासरत हैं, जिनके स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा एवं शासन के नियमानुसार दी जा रही सेवाओं की जानकारी ली गई।

कागज़ों में कैद नागरिक, पहचान, अधिकार और भारतीय लोकतंत्र का बदलता चेहरा- राजकुमार अग्रवाल


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, गरिमा और जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आम भारतीय नागरिक के जीवन का एक बड़ा हिस्सा कागज़ों, प्रमाण पत्रों, बायोमेट्रिक सत्यापन, डिजिटल पहचान और सरकारी प्रक्रियाओं में उलझता चला गया है। आज भारत का नागरिक अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए बार-बार सरकार के सामने खड़ा दिखाई देता है। वह जन्म लेता है तो जन्म प्रमाण पत्र चाहिए, स्कूल जाता है तो आधार चाहिए, मोबाइल लेना है तो बायोमेट्रिक चाहिए, बैंक खाता खोलना है तो केवाईसी चाहिए, शादी करनी है तो विवाह प्रमाण पत्र चाहिए, यात्रा करनी है तो पहचान पत्र चाहिए, जमीन खरीदनी है तो दर्जनों दस्तावेज चाहिए, सरकारी योजना लेनी है तो हर महीने जीवित होने का प्रमाण चाहिए।

यह स्थिति केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तार नहीं रह गई है, बल्कि धीरे-धीरे नागरिक और राज्य के बीच अविश्वास का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में नागरिक सरकार के लिए बना है या सरकार नागरिकों के लिए? क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल कागज़ों और बायोमेट्रिक डेटा से तय होगी? क्या इंसान की गरिमा से बड़ा कोई दस्तावेज हो सकता है?

*पहचान का संकट: नागरिक या दस्तावेज?*

भारत में आज एक सामान्य नागरिक के पास कई प्रकार के पहचान पत्र होते हैं—आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, परिवार पहचान पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक, बिजली बिल, गैस कनेक्शन, स्वास्थ्य कार्ड और न जाने कितने अन्य दस्तावेज।

विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी दस्तावेज हर जगह मान्य नहीं होता। एक विभाग कहता है आधार लाओ, दूसरा कहता है राशन कार्ड चाहिए, तीसरा कहता है परिवार पहचान पत्र जरूरी है, चौथा कहता है केवल पासपोर्ट चलेगा। नागरिक की पहचान कभी पूरी नहीं मानी जाती।

यह स्थिति केवल तकनीकी अव्यवस्था नहीं है, बल्कि प्रशासनिक सोच का परिणाम है जिसमें नागरिक को हमेशा “संदेह” की नजर से देखा जाता है। सरकारें मानकर चलती हैं कि व्यक्ति गलत जानकारी दे सकता है, इसलिए हर कदम पर प्रमाण मांगो, सत्यापन कराओ, बायोमेट्रिक लो, फोटो लो, हस्ताक्षर मिलाओ, फाइल बनाओ और नागरिक को दफ्तर-दफ्तर भटकाओ।

एक गरीब मजदूर, किसान, विधवा महिला या बुजुर्ग व्यक्ति के लिए यह प्रक्रिया किसी यातना से कम नहीं होती। वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है, साइबर कैफे में पैसे खर्च करता है, लाइन में खड़ा रहता है और अंत में अक्सर सुनता है—“सिस्टम डाउन है, कल आना।”

*डिजिटल इंडिया: सुविधा या नया बोझ?*

डिजिटल इंडिया का विचार सुनने में आकर्षक लगता है। सरकार ने दावा किया कि डिजिटल तकनीक भ्रष्टाचार कम करेगी, पारदर्शिता बढ़ाएगी और लोगों को सुविधा देगी। लेकिन जमीनी सच्चाई अलग दिखाई देती है।

आज गांवों में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। इंटरनेट की गुणवत्ता खराब है। बुजुर्गों को तकनीक समझ नहीं आती। पढ़े-लिखे लोग भी कई बार ऑनलाइन पोर्टल और ऐप्स की जटिलता से परेशान हो जाते हैं।

सरकारें मान बैठी हैं कि हर नागरिक डिजिटल रूप से सक्षम है। लेकिन भारत की वास्तविकता यह नहीं है। यहां अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो ऑनलाइन फार्म भरने, ऐप डाउनलोड करने, ओटीपी डालने और दस्तावेज अपलोड करने की प्रक्रिया से डरते हैं।

डिजिटल इंडिया का सपना तब तक अधूरा रहेगा जब तक तकनीक इंसान के लिए सरल नहीं बनती। अगर तकनीक नागरिक को और अधिक परेशान करे, तो वह सुविधा नहीं बल्कि नया बोझ बन जाती है।

*आधार और बायोमेट्रिक का जाल*

आधार कार्ड को शुरू में केवल एक पहचान परियोजना बताया गया था। बाद में धीरे-धीरे इसे हर चीज से जोड़ दिया गया—बैंक खाते, मोबाइल नंबर, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, स्कूल दाखिला, अस्पताल और यहां तक कि मृत्यु प्रमाण पत्र तक।

आज स्थिति यह है कि अगर किसी व्यक्ति का फिंगरप्रिंट मशीन में मैच नहीं हुआ, तो उसका राशन रुक सकता है। बुजुर्गों के अंगूठे कई बार मशीन नहीं पहचानती। मजदूरों के हाथों की रेखाएं मिट जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट नहीं चलता। लेकिन सिस्टम कहता है—“ऑथेंटिकेशन फेल।”

सवाल यह है कि क्या किसी इंसान का जीवन एक मशीन के सफल या असफल होने पर निर्भर होना चाहिए?

तकनीक का उद्देश्य इंसान की मदद करना होना चाहिए, न कि इंसान को मशीन के सामने असहाय बना देना।

*नाम पर भी नियंत्रण?*

भारतीय समाज में नाम केवल पहचान नहीं होता, वह संस्कृति, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा होता है। लेकिन आज नाम बदलना भी एक कठिन प्रशासनिक प्रक्रिया बन चुका है।

कई राज्यों में स्कूल रिकॉर्ड, आधार, परिवार पहचान पत्र, बैंक खाते और अन्य दस्तावेजों में नाम की छोटी सी गलती सुधारने में महीनों नहीं बल्कि वर्षों लग जाते हैं।

हरियाणा जैसे राज्यों में पुराने रिकॉर्ड बदलवाना लगभग असंभव माना जाता है। जिन लोगों के नाम 1970 या 1980 के दशक में स्कूलों में गलत दर्ज हो गए थे, वे आज तक सुधार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को अपने नाम, पहचान और निजी जीवन पर अधिकार होना चाहिए। लेकिन जब एक नागरिक अपने ही नाम में बदलाव नहीं करवा पाता, तब यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न में बदल जाती है।

*हरियाणा की “जीवंत प्रमाण” व्यवस्था और महिलाओं का अपमान*

हरियाणा सरकार की दीन दयालु लाडो लक्ष्मी योजना ने एक गंभीर बहस को जन्म दिया है। योजना के तहत आर्थिक सहायता पाने वाली महिलाओं से हर महीने “जीवित होने का प्रमाण” मांगा जा रहा है। मोबाइल पर संदेश भेजे जाते हैं जिनमें महिलाओं से अपनी फोटो अपलोड करने को कहा जाता है ताकि वे साबित कर सकें कि वे जीवित हैं।

यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। यह एक सामाजिक और मानवीय प्रश्न है।

एक ओर सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की बात करती है, दूसरी ओर उन्हीं महिलाओं से हर महीने जिंदा होने का सबूत मांगती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों महिलाएं ऐसी हैं जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है। उन्हें साइबर कैफे या दूसरों के मोबाइल पर निर्भर रहना पड़ता है। कई महिलाएं तकनीकी जानकारी के अभाव में योजना से वंचित हो सकती हैं।

सवाल यह भी है कि जब बुजुर्ग पेंशन, विधवा पेंशन और अन्य योजनाओं में हर महीने ऐसा प्रमाण नहीं मांगा जाता, तो केवल महिलाओं के लिए यह व्यवस्था क्यों?

आर्थिक सहायता देना स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन सहायता के बदले किसी नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाना लोकतांत्रिक संवेदनशीलता नहीं कहलाता।

*सरकारी अविश्वास की राजनीति*

भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में एक गहरी मानसिकता दिखाई देती है—नागरिक पर भरोसा मत करो।

अगर कोई व्यक्ति पेंशन ले रहा है, तो उससे बार-बार जीवित होने का प्रमाण मांगो। अगर कोई किसान सब्सिडी चाहता है, तो उससे कई प्रमाण पत्र मांगो। अगर कोई छात्र छात्रवृत्ति चाहता है, तो उसकी पहचान, आय, निवास, जाति और बैंक खाते का बार-बार सत्यापन करो।

सरकारें यह भूल जाती हैं कि हर अतिरिक्त दस्तावेज गरीब व्यक्ति के लिए अतिरिक्त बोझ होता है।.

जिस देश में करोड़ों लोग रोज कमाकर खाते हैं, वहां बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाना आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का उत्पीड़न बन जाता है।

*क्या नागरिक की स्वतंत्रता घट रही है?*

भारतीय संविधान व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। लेकिन आज नागरिक का जीवन लगातार निगरानी, सत्यापन और डेटा संग्रह के दायरे में आ रहा है।

मोबाइल नंबर से लेकर बैंक खाते तक, यात्रा से लेकर खरीदारी तक, लगभग हर गतिविधि किसी न किसी डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज हो रही है।

सरकारें इसे सुरक्षा और पारदर्शिता का नाम देती हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह होता है—राज्य की शक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए?

अगर सरकार नागरिक के हर कदम पर निगरानी रखे, हर सुविधा के बदले पहचान मांगे और हर अधिकार को कागजी प्रक्रिया से जोड़ दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे नियंत्रण तंत्र में बदल सकता है।

*संघीय ढांचा और अलग-अलग राज्यों की समस्याएं*

भारत एक संघीय लोकतंत्र है। अलग-अलग राज्यों की अपनी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हैं। लेकिन लगभग हर राज्य में नागरिक दस्तावेजों और सत्यापन की समस्याओं से जूझ रहा है।

*उत्तर प्रदेश*

जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र के लिए लंबी प्रक्रियाएं आम शिकायत हैं।

*बिहार*

भूमि रिकॉर्ड और पहचान दस्तावेजों में त्रुटियां वर्षों तक लोगों को परेशान करती हैं।

*राजस्थान*

डिजिटल सेवाओं के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी पहुंच सीमित है।

*पंजाब*

भूमि रजिस्ट्रेशन और राजस्व रिकॉर्ड में देरी आम समस्या है।

*महाराष्ट्र*

शहरी क्षेत्रों में ऑनलाइन सिस्टम होने के बावजूद कई सेवाओं में दस्तावेजों की पुनरावृत्ति होती है।

*हरियाणा*

परिवार पहचान पत्र, सामाजिक योजनाओं और दस्तावेज सत्यापन की जटिलता लगातार विवाद का विषय रही है।

इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की सोच से जुड़ा मुद्दा है।

*गरीब सबसे ज्यादा क्यों परेशान होता है?*

एक अमीर व्यक्ति एजेंट रख सकता है, वकील कर सकता है, निजी सुविधा ले सकता है। लेकिन गरीब व्यक्ति के पास समय, संसाधन और तकनीकी सहायता नहीं होती।

अगर किसी मजदूर का राशन कार्ड बंद हो जाए, तो उसका परिवार भूखा रह सकता है। अगर किसी बुजुर्ग की पेंशन रुक जाए, तो उसकी दवा बंद हो सकती है। अगर किसी महिला का दस्तावेज गलत हो जाए, तो वह सरकारी योजना से बाहर हो सकती है।

कागजी व्यवस्था का सबसे बड़ा बोझ हमेशा कमजोर वर्ग पर पड़ता है।

*क्या यह विकास का मॉडल है?*

सरकारें अक्सर कहती हैं कि यह सब “सिस्टम सुधार” के लिए जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का अर्थ केवल डेटा संग्रह और सत्यापन है?

*विकास का वास्तविक अर्थ होना चाहिए—*

शिक्षा की सरल पहुंच

स्वास्थ्य सुविधाएं

रोजगार

सुरक्षित जीवन

न्याय तक आसान पहुंच

सम्मानजनक प्रशासन

अगर नागरिक अपना अधिकांश समय केवल प्रमाण पत्र बनवाने में बिताने लगे, तो यह विकास नहीं बल्कि प्रशासनिक जटिलता का विस्तार कहलाएगा।

*लोकतंत्र का मूल प्रश्न: सरकार किसके लिए?*

लोकतंत्र का आधार नागरिक होता है। सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है ताकि वह जनता की सुविधा और अधिकारों की रक्षा कर सके।

लेकिन जब नागरिक ही सरकार के सामने बार-बार अपनी पहचान साबित करने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

सरकार का काम नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय शक की निगाह से देखना।

अगर कोई व्यक्ति दस्तावेज नहीं बनवाना चाहता, तो उसे बुनियादी अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकता का अर्थ केवल सरकारी डेटाबेस में दर्ज होना नहीं है। नागरिकता एक संवैधानिक और मानवीय संबंध है।

*कोरोना काल और पहचान की राजनीति*

कोरोना महामारी के दौरान भी लोगों को कई प्रकार के प्रमाण और दस्तावेजों से गुजरना पड़ा। कई जगह राशन, यात्रा और सहायता योजनाओं के लिए पहचान आधारित प्रक्रियाएं लागू की गईं।

इस दौरान यह स्पष्ट हुआ कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था संकट के समय भी कागजी नियंत्रण से बाहर नहीं निकल पाती।

जब लोगों को तत्काल राहत चाहिए थी, तब भी कई स्थानों पर दस्तावेज प्राथमिकता बन गए।

*क्या समाधान संभव है?*

समस्या केवल आलोचना से हल नहीं होगी। कुछ बुनियादी सुधार जरूरी हैं—

1. एकीकृत पहचान व्यवस्था

अगर सरकार पहचान प्रणाली बना चुकी है, तो एक ही पहचान हर विभाग में मान्य होनी चाहिए।

2. मानव आधारित विकल्प

जहां डिजिटल सत्यापन असफल हो, वहां मानवीय विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।

3. ग्रामीण डिजिटल सहायता

हर गांव में मुफ्त तकनीकी सहायता केंद्र स्थापित होने चाहिए।

4. दस्तावेजों की संख्या कम हो

सरकारी सेवाओं में आवश्यक दस्तावेजों की सीमा तय होनी चाहिए।

5. सम्मानजनक प्रशासन

किसी भी योजना में ऐसी भाषा और प्रक्रिया न हो जो नागरिक की गरिमा को ठेस पहुंचाए।

6. डेटा सुरक्षा कानून

नागरिकों के बायोमैट्रिक और निजी डेटा की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

*सबसे बड़ा सवाल*

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—क्या सरकार नागरिक पर भरोसा करती है?

अगर हर महीने किसी महिला से पूछा जाए कि “साबित करो कि तुम जीवित हो,” तो यह केवल तकनीकी सत्यापन नहीं बल्कि राज्य और नागरिक के बीच अविश्वास का प्रतीक बन जाता है।

एक लोकतंत्र में सरकार का दायित्व नागरिक को सम्मान देना है, न कि उसे हर समय प्रमाण देने के लिए मजबूर करना।

भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सम्मान महसूस करे, जब प्रशासन सरल हो, जब सरकार जनता पर भरोसा करे और जब व्यक्ति की गरिमा को कागजों से ऊपर रखा जाए।

आज जरूरत इस बात की है कि भारत डिजिटल और प्रशासनिक सुधारों को मानवीय दृष्टिकोण से देखे। तकनीक नागरिक की सेवक बने, मालिक नहीं। दस्तावेज सुविधा का माध्यम बनें, उत्पीड़न का नहीं।

अगर भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे केवल डिजिटल डेटा नहीं बल्कि मानवीय गरिमा को केंद्र में रखना होगा। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की असली पहचान उसके नागरिकों के सम्मान से होती है, न कि उनके पास मौजूद कागजों की संख्या से।

*लेखक*

राजकुमार अग्रवाल

वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक एवं दुभाषी दैनिक ‘अटल हिन्द’ के सम्पादक।


पीकप में लगी आग, वाहन सहित तेंदूपत्ता जलकर हुआ राख, हाथी से ग्रामीणो में दहशत, वन विभाग एलर्ट


उमरिया

जिले के मानपुर विधानसभा मुख्यालय क्षेत्र अंतर्गत बल्हौड़ समिति के ग्राम परासी ‘अ’ से तेंदूपत्ता लोड कर निकली एक पिकअप वाहन में अचानक भीषण आग लग गई। घटना में वाहन सहित लगभग 60 बोरी तेंदूपत्ता जलकर पूरी तरह राख हो गया। जानकारी के अनुसार पीकप वाहन क्रमांक MP 18 GA 5243 में तेंदूपत्ता लोड कर मुख्य सड़क की ओर ले जाया जा रहा था, जो प्रतिक्षालय एवं स्वागत गेट से लगभग 150 मीटर पहले मोड़ के पास पहुंचा ही था कि अचानक धुआं उठने लगा। चालक कुछ समझ पाता, उससे पहले ही आग ने पूरी गाड़ी को अपनी चपेट में ले लिया और देखते ही देखते पिकअप वाहन धू-धू कर जलने लगा। आग इतनी भयावह थी कि वाहन में रखे सभी जरूरी दस्तावेज भी जलकर नष्ट हो गए, हालांकि राहत की बात यह रही कि चालक एवं वाहन मालिक विजय कुमार पटेल, निवासी नगनौड़ी, तहसील जयसिंहनगर, जिला शहडोल, समय रहते वाहन से बाहर निकल आए और सुरक्षित बच गए। घटना के बाद क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया, स्थानीय लोगों ने आग बुझाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक पूरा वाहन जल चुका था, अब इस घटना को लेकर कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं, यदि समिति से तेंदूपत्ता लोड कर वाहन भेजा गया था, तो सुरक्षा एवं जवाबदेही किसकी बनती जांच का विषय हैं।

*हाथी से ग्रामीणो में दहशत, वन विभाग एलर्ट*


उमरिया जिले के बांधवगढ़ वन परिक्षेत्र में जंगली हाथी ई-5 की लगातार बदलती लोकेशन ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। बीते सोमवार की रात हाथी का मूवमेंट डबरौंहा,धनवाही,लगवारी,बड़ेरी और कछवार क्षेत्र में देखा गया,जिसके बाद गांवों में दहशत का माहौल बन गया। मंगलवार सुबह हाथी के रोहनिया बीट की ओर बढ़ने की जानकारी सामने आई है,जिस पर वन विभाग लगातार नजर बनाए हुए है। जानकारी के अनुसार ये वही हाथी है जिसने अनूपपुर क्षेत्र में जमकर उत्पात मचाया था। उस दौरान कई मवेशियों को नुकसान पहुंचाने के साथ इंसानों पर भी हमले किए गए थे। बढ़ते खतरे को देखते हुए पार्क प्रबंधन ने हाथी का रेस्क्यू कर उसे बांधवगढ़ के खितौली वन क्षेत्र में निगरानी के बीच रखा था, लेकिन हालिया दिनों में हाथी वहां से निकलकर अलग-अलग क्षेत्रों में विचरण कर रहा है। हालांकि राहत की बात यह है कि हाथी में कॉलर आईडी लगी हुई है, जिससे वन अमला उसकी हर गतिविधि की मॉनिटरिंग कर पा रहा है। आपको बता दे इस जंगली हाथी का नाम ई-5 है। वन विभाग की टीमें लगातार सक्रिय हैं और सोशल मीडिया व मुनादी के जरिए ग्रामीणों को  उक्त हाथी से सजग रहने की सलाह दी जा रही है। अब तक हाथी ने आबादी वाले क्षेत्र में कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचाया है, लेकिन उसके पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए लोगों में भय बना हुआ है। वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि हाथी दिखने पर उसके पास न जाएं, रात में अकेले जंगल या नदी किनारे न निकलें और किसी भी मूवमेंट की सूचना तत्काल वन अमले को दें।

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