विश्व के प्रथम प्रस्तार श्रीयंत्र मंदिरअमरकंटक का निर्माण पूर्ण, विधि - विधान के साथ होगी प्राण प्रतिष्ठा
*श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री मां त्रिपुर सुंदरी, पांचवां धाम बनने की कल्पना*
( मनोज कुमार द्विवेदी, अनूपपु्र, मप्र )
अनूपपु्र
हम सभी अत्यंत सौभाग्यवान हैं कि अपने जीवन मे भारतीय प्राचीन उपासना पद्धति के प्रसिद्ध तांत्रिक शक्तिपीठ श्रीयंत्र मन्दिर अमरकंटक को आकार लेता देख पाए और अब भगवती मां जगदम्बा की कृपा से इसकी प्राण प्रतिष्ठा के पुनीत महोत्सव के साक्षी बनेगें। मां नर्मदा की उद्गम नगरी अमरकंटक की पावन धरा पर विश्व प्रसिद्ध श्रीयंत्र महामेरु शक्तिपीठ के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन आगामी
23 से 26 अक्टूबर 2026 को होने जा रहा है। इसकी सम्पूर्ण तैयारियां हो चुकी हैं । मन्दिर परिसर और अमरकंटक नगर की सजावट का कार्य तेजी से किया जा रहा है। श्रीयंत्र महामेरु मन्दिर , सोनमूडा रोड, अमरकंटक मे आयोजित होने वाले इस ऐतिहासिक ,भव्य, दिव्य महोत्सव के आयोजक
हरिद्वार के विख्यात संत एवं श्रीयंत्र मन्दिर - बटे कृष्ण आश्रम अमरकंटक के प्रमुख, महंत श्री शरद पुरी महाराज के मार्गदर्शन में एवं समस्त शिष्यगण , भक्तगण एवं नगरवासी पूरी उर्जा ,उत्साह और तन्मयता के साथ महोत्सव की तैयारी कर रहे हैं। कार्यक्रम मे शामिल होने के लिये देश - विदेश के कोने - कोने से आने वाले हजारों संतों , आचार्यो, अतिथियों, श्रद्धालुओं , शिष्यमंडल की वृहद व्यवस्था की जा रही है।
ऐसा कहा जाता है कि श्रीयंत्र मन्दिर का निर्माण , मन्दिर का कार्य प्रारंभ करने वाले के जीवन मे पूरा नहीं हो पाता। श्री यंत्र मन्दिर अमरकंटक का निर्माण परमपूज्य विद्वान ब्रम्हलीन संत श्री श्री 1008 श्री अटल पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी शुकदेवानंद जी महाराज के मार्गदर्शन और नेतृत्व मे लगभग तीन दशक पहले शुरु किया गया था।
इस मन्दिर की अत्यंत महत्ता है।
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ लेखक, पत्रकार स्व राजू तिवारी जी ने इस मन्दिर पर विस्तार से प्रकाश डाला है। आज आप सभी को यह जरुर जानना चाहिये कि मैकल और विंध्य पर्वत के त्रिकोण अमरकंटक में अवस्थित श्रीयंत्र मंदिर समूचे संसार में श्री यंत्र महामेरु शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।
प्रसिद्ध तांत्रिक मंदिर कामाख्या की भव्यता को आलोकित करने वाला यह श्रीयंत्र महामेरु ज्योतिष विज्ञान का प्रसिद्ध देवशास्त्र भी है । जहां प्राकृतिक रहस्यों के साथ पृथ्वी एवं ग्रहों की गणना, गति एवं गणना क्रिया को समझा जा सकता है।
मंदिर निर्माण का बीड़ा ब्रम्हलीन संत महामंडलेश्वर स्वामी शुकदेवानंद पुरी जी महाराज ने उठाया था। यह तांत्रिक शक्तिपीठ लगभग तीन दशक मे धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण कर पाया।
मंदिर का आधार पद्मबंध, मध्य भाग त्रिकोणात्मक रचना तथा मंदिर का शीर्ष भाग देवबंध के स्वरूप में बनाया गया है। मंदिर के चारों कोनों में कालतत्व का अद्भुत एवं दर्शनीय अंकन किया गया है।
पृथ्वी एवं समस्त ग्रहों की गणना, गणना गति की क्रिया मंदिर के पांचवें धाम में उपलब्ध होगी। अमरकंटक में स्थापित श्रीयंत्र महामेरु शक्तिपीठ में वास्तुशास्त्र, गणित, तंत्र विज्ञान, कला-कौशल और वेदांत की ऐसी साकार कल्पना की गई है, जिसे आने वाले समय में भी एक अद्भुत उदाहरण के रूप में देखा जाएगा। श्रीयंत्र मंदिर की गणना और इसकी संरचना अपने आप में विशिष्ट है।
मंदिर के निर्माण में श्रीयंत्र के विभिन्न अंगों और ज्यामितीय संरचनाओं को वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से समाहित किया गया है। विश्व के प्रथम महामेरु प्रस्तार के रूप में इस मंदिर को अद्भुत मंदिर बताया जा रहा है। मंदिर की स्थापना और उसके स्वरूप को लेकर बताया गया है कि श्रीयंत्र के विभिन्न प्रस्तारों में प्रथम भू-प्रस्तार, द्वितीय कूर्म-प्रस्तार तथा तृतीय मेरु-प्रस्तार माना जाता है। इसी परंपरा के आधार पर अमरकंटक में निर्माणाधीन यह मंदिर अपने आप में एक विशिष्ट आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है।
*सघन वनांचल के बीच शक्तिपीठ श्रीयंत्र मंदिर*
सघन वनांचल के बीच पहाड़ी क्षेत्र में स्थित अमरकंटक में श्रीयंत्र मंदिर का निर्माण किया गया है। अत्यंत मनोरम तथा प्राकृतिक वातावरण वाले इस स्थान को शक्तिपीठ के लिए चुना गया है। मंदिर का निर्माण निर्धारित वास्तु एवं तांत्रिक मान्यताओं के अनुरूप होगा। मंदिर के लिए भव्य एवं अनोखे स्वरूप वाला प्रवेश द्वार बनाया गया है। जिस स्थान पर श्रीयंत्र मंदिर की स्थापना की गयी है, वह प्राकृतिक दृष्टि से भी अत्यंत सुंदर एवं दुर्लभ क्षेत्र है। यहां जलधारा सहित शिवलिंग की आकृति जैसी प्राकृतिक संरचनाएं भी दिखाई देती हैं।
श्रीयंत्र महामेरु मंदिर
महाशक्ति मंडल में अमरकंटक का महामेरु श्रीयंत्र मंदिर लगभग 52 फीट लंबा, 52 फीट चौड़ा और 52 फीट ऊंचा है। गिरि वनवासी विकास संस्थान के सदस्य त्रिभुवेन्द्र कुमार दास के अनुसार यह मंदिर जगन्नाथ, रामेश्वरम्, बद्रीनाथ और द्वारिकापीठ की तरह विश्व में अपनी अलग पहचान बनाने वाला पांचवें धाम के स्वरूप में विकसित किया जा रहा है।
महर्षि अगस्त्य द्वारा उपदिष्ट मंदिर-विज्ञान के आधार पर निर्मित श्रीयंत्र महामेरु मंदिर का आधार अत्यंत विशिष्ट है। मंदिर की पूरी संरचना में श्रीयंत्र के स्वरूप को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समाहित किया गया है।
*श्रीयंत्र की अद्भुत संरचना*
मंदिर के शीर्ष भाग में श्रीयंत्र की दसों आवरण संरचनाओं को अत्यंत कठिनाई के साथ उकेरा गया है। इनमें त्रिकोण,अष्टकोण, अंतर्दशार,बहिर्दशार,चतुर्दशार,अष्टदल,षोडशदल, तीन दल,वृत्त,बिंदु, तीन भूपुर आदि श्रीयंत्र के प्रमुख अंगों को दर्शाया गया है।
श्रीयंत्र की इस जटिल संरचना को मंदिर में अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक आकृति का अपना आध्यात्मिक एवं तांत्रिक महत्व बताया गया है। मंदिर के चारों कोनों पर सिंह और नाग की आकृति मंदिर की वास्तुकला में विभिन्न प्रतीकों का प्रयोग किया गया है। मंदिर के चारों कोणों पर अत्यंत बलशाली सिंहों की आकृतियां बनाई गई हैं।
इसके साथ ही नाग और अन्य प्रतीकात्मक आकृतियों को भी मंदिर की संरचना में स्थान दिया गया है। इनके माध्यम से शक्ति, काल और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीकात्मक स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।
मंदिर का शीर्ष भाग श्रीयंत्र मंदिर की वास्तुकला में देवी राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी का स्वरूप प्रमुख है। मंदिर के शीर्ष भाग में श्रीयंत्र के विभिन्न आवरणों को अत्यंत कलात्मक एवं कठिन प्रक्रिया से तैयार किया गया है। मंदिर की संरचना में श्रीयंत्र के प्रत्येक भाग को निर्धारित क्रम में स्थापित किया गया है। इसके निर्माण में वास्तुशास्त्र तथा तंत्रशास्त्र की मान्यताओं का विशेष ध्यान रखा गया है।
*श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री मां त्रिपुर सुंदरी*
श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री आदि शक्ति श्री महात्रिपुर सुंदरी की पूजा एवं प्रतिष्ठा मंदिर में की जाएगी। मंदिर के गर्भगृह में देवी की प्रतिमा स्थापित किए जाने की योजना है। यहां श्रद्धालुओं को श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी की पूजा-अर्चना का अवसर प्राप्त होगा। मंदिर में प्रवेश और पूजा की व्यवस्था भी धार्मिक परंपराओं एवं निर्धारित विधि के अनुसार किया जाएगा।
*पांचवां धाम बनने की कल्पना*
भारतीय संस्कृति में मनुष्य के जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माने गए हैं। श्रीयंत्र महामेरु मंदिर को इन आध्यात्मिक उद्देश्यों की साधना का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की कल्पना की गई है।
इस मंदिर के माध्यम से लोगों को अपने जीवन के धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान बना सकता है।आध्यात्मिक लक्ष्य को समझने और साधना की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलने की उम्मीद व्यक्त की गई है। अमरकंटक जैसे प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वातावरण वाले क्षेत्र में यह मंदिर देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों मे शामिल है। श्रीयंत्र मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा के बाद इसका पुण्य प्रताप सदा सर्वत्र व्याप्त होगा।